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واي چه خسته مي کند تنگي اين قفس مرا |
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جواني حسرتا با من وداع جاوداني کرد |
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ستايش مر خدا را شايد و شکر و سپاس او را |
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گشودي چشم در چشم من و رفتي به خواب اصغر |
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روي در کعبه اين کاخ کبود آمده ايم |
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دلم جواب بلي مي دهد صلاي تو را |
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نامه زد بوم از خراسانم که گلشن نيز رفت |
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اي خدا هر خبري مي شنويم |
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فـَرخا چوني و چون مي چرخدت ايام عمر |
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نگاهي کرده در آفاق و ماهي کرده ام پيدا |
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دوستانم ناخلف انگاشتند |
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دلها که آرزوي امام رضا کنند |
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هرکه نه در سايه ايمان شود |
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اي کعبه دري باز به روي دل ما کن |
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کوره ي عشق بيفروز که کانون باشي |
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چه جاي سر اگر سرور نباشد |
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خبر واي به سر وقت من آمد شب دوش |
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آمدي جانم به قربانت ولي حالا چرا |
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تا هستم اي رفيق نداني که کيستم |
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آن را که خواندي اي دل غافل حبيب من |
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قمار عاشقان بُردي ندارد از نَـداران پرس |
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تا باد صبا کوي تو اش دسترس افتاد |
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اي فلک خون دل از خوان تو نان، ما را بس |
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شب است و چشم من و شمع اشک بارانند |
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چند بارد غم دنيا به تن تنهايي |
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الا اي نوگل رعنا که رَشک شاخ شمشادي |
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تا که از طارم ميخانه نشان خواهد بود |
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باز پيرانه سرم عشق تو در ياد آمد |
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آوخ آن وحشي غزال دل شکار از من رميد |
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شب است و چشم به راه ستاره ي سحرم |
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يارب آن يوسف گمگشده به من باز رسان |
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ابديت که به هر جلوه تجلا مي کرد |
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ستون عرش خدا قائم از قيام محمد |
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نيما! غم دل گو که غريبانه بگرييم |
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هنوز هست به گوشم صداي سبحاني |
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گذار آرد مه من گاه گه از اشتباه اينجا |
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ماندم به چمن شب شد و مهتاب برآمد |
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در دياري که در او نيست کسي يار کسي |
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بهار آمد و فرخ فرح، فراز آورد |
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بنال اي ني که من غم دارم امشب |
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مرا هر گه بهار آيد به خاطر ياد يار آرد |
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به دوش ِ دل ز غم عشق بارها دارم |
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نفسي داشتم و ناله و شيون کردم |
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ماه من! چهره برافروز که آمد شب عيد |
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ريختم با نوجواني باز طرح زندگاني |
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سر بر آريد حريفان که سبويي بزنيم |
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مرا نديده برفتي، نديده ام بگرفتي |
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صحنه آفاق چون تو ماه ندارد |
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تا نپنداري که من سر پيچم از پيمان پير |
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سري به سينه خود تا صفا تواني يافت |
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دامن مکش به ناز، که هجران کشيده ام |
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آسمان خود خبر از عالم درويشان است |
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تا جلوه کرد طلعت ساقي به جام ما |
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سر خوش آنان که سر خيره به خمخانه زدند |
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منم که شعر و تغزل پناهگاه من است |
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رقيبت گر هنر هم دزدد از من، من نخواهد شد |
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بود آيا که در صلح وصفا بگشايند |
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همدمان يارب کجا رفتند و ياران را چه شد |
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آنان که سرمه از رد ِ پاي شما کنند |
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علي اي هماي رحمت تو چه آيتي خدا را |
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گر گوش مال عشق نبودي به ساز من |
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آمد بهار و لاله شد از ژاله پر ز مي |
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کوي ميخانه ما آب و هوايي دارد |
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رو به هر قبله که کردم، صنما سوي تو بود |
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خيز تا خيمه ي عزلت به خرابات بريم |
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هر رايت از تو ديدم بود از بلندي آيت |
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از غم جدا مشو که غنا مي دهد به دل |
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چشم و ابروي تو تا تير و کماني دارد |
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اسم اعظم باز گردد با سليمان غم مخور |
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نه غمي مي رود و ني هوسي مي آيد |
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نه از اين ورطه نجاتي که کناري گيرند |
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تا بود خون جگر خوان جهان اين همه نيست |
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باغ ها خلوت و خالي است کجايي بلبل |
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به توديع تو جان مي خواهد از تن شد جدا حافظ |
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رسيدم در تو و دستت ز دامن برنمي دارم |
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اي صبا با تو چه گفتند که خاموش شدي |
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محرم آمد و نو کرد درد و داغ حسين |
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سالها دخمه ي خود ظلمت زندان کردم |
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ماهم که هاله اي به رخ از دود آهش است |
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کس نيست در اين گوشه فراموش تر از من |
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پرتو ذات ازل را دو جهان ذراتند |
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کاش پيوسته گل و سبزه وصحرا باشد |
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در بهاران سري از خاک برون آوردن |
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الا اي هدهد تخت سليمان |
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مستمندم بسته ي زنجير و زندان، يا علي |
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گران سِـيرش مبين قاصد که بي پايان بود راهش |
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ره گشودم در دل از بيگانگي با آشنايي |
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عجب پايي گريزان دارد اين عمر |
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اي تو ديوانه که هر بيتش يکي
دنيا غزل |
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ندانم اين جهان يا آن جهان به |
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عمر بگذشت به کوچيدن ايامي چند |
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بگشا بر رخ مي خواره دَري بهتر از اين |
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اي گل به شکر آنکه در اين بوستان گلي |
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شب به هم درشکند زلف چليـپايي را |
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اگر خورشيد شد خاموش ماه و اختري هم هست |
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شيعيان ديگر هواي نينوا دارد حسين |
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عجين تن نِـيي کز ماء و تيني |
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زندگي خسته کند گر همه يکسان
گذرد |
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در قفسم حوصله سر مي رود |
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جهان من همه آيينه و عشق است
آيينم |
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هر دمم ديده به ديدار عزيزي
بگشايد |
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سِـر سوداي تو در هيچ سري نيست
که نيست |
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هدهد بيا به شهر صبا مي فرستمت |
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با تو گر عشق ندادند گناه من
نيست |
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از من چه
طالعي است که با اين شتاب عمر |
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تسليم شو که حکم
قضا مي توان شنيد |
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عاشقي درد است و درمان نيز هم |
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آنجا که به شمشير جفاي تو بميرم |
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چه گزارشي است
يارب به تغني نوايي |
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نه عقلي و نه
ادراکي و من خود خاک و خاشاکي |
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آفتاب تو ام از
روزن دل مي تابد |
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پاشو اي مست که
دنيا همه ديوانه ي توست |
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از اين شيطان که
من ديدم ، کسي جان در نخواهد برد |
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پيمانه الستم
پيموده شور ومستي |
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داغ يارانم به جان
تازد که ياران را چه شد |
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آفرينش کتاب حکمت
اوست |
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حافظا باز از تو
استدعاي همت مي کنم |
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بي تو اي دل نکند
لاله به بار آمده باشد |
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تويي که جوهر جاني
و جان هر دو جهاني |
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گفتي تو هم به
مجلس اغيار مي روي |
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اي هدهد از سرير
سليمان ما بگو |
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درس عشقي
که شد از عهد دبستان از بر |
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گل و شمعم به مزار
دل خونين آمد |
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دوشم چه
خواب خوش که شب غم سر آمدي |
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از متن
جمال تو کجا ديده شود سير |
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زدي حلقه
ام بر در آشنايي |
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تنيده دور و بر
جان من طناب تنم |
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عشق باز آي که
جاني به تنم باز آيد |
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گلچين که آمد اي
گل من در چمن نباشم |
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سلطان قضا صولتي
از سلطنت اوست |
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برداشت پرده شمعم
و پروانه پر گرفت |
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سبوکشان که به
ظلمات عشق خضر رهند |
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چند بيداد کني
دادم کن |
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اي آفتاب هاله اي
از روي ماه تو |
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شب چراغ خلوت شب
زنده دارانم چو شمع |
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هاتفم زير لبي گاه
صدا مي گويد |
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بجهيم از خود و در
جبهه بجوييم خدا را |
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اي بر سرير ملک
ازل تا ابد خدا |
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سعديا! از باب
عشقت در گلستان آمديم |
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عمر دنيا به سر
آمد که صبا مي ميرد |
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